फोटो: Abdul Kayum/Pexels.com

हिमालय में सूखता ‘एशियन वॉटर टॉवर’, हर साल अरबों टन भूजल गायब

सैटेलाइट और एआई पर आधारित एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि हिमालयी क्षेत्र में तेज़ी से घटता भूजल करोड़ों लोगों के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

एशिया की जल जीवनरेखा कहा जाने वाला हिमालय अब तेजी से सूखता जा रहा है। एक नई सैटेलाइट आधारित स्टडी के मुताबिक, ‘एशियन वॉटर टॉवर’ के नाम से मशहूर एशिया के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में हर साल अरबों टन भूजल खत्म हो रहा है। यह वही क्षेत्र है, जहां से निकलने वाला पानी भारत सहित दक्षिण और मध्य एशिया के कई देशों की नदियों, खेती और करोड़ों लोगों के जीवन को सहारा देता है।

अध्ययन के अनुसार, इस पूरे इलाके में हर साल करीब 2,420 करोड़ टन भूजल की कमी हो रही है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यह गिरावट आने वाले वर्षों में कृषि, पीने के पानी और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए बड़ा संकट बन सकती है।

यह शोध चीन की एकेडमी ऑफ साइंसेज के एयरोस्पेस इंफॉर्मेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर वांग शुडोंग के नेतृत्व में किया गया है और इसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरमेंटल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं। चुनौतीपूर्ण पहाड़ी भूगोल के कारण जहां भूजल का आकलन मुश्किल था, वहीं वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एक नया मॉडल विकसित किया।

इसमें मल्टी-सेंसर सैटेलाइट डेटा, अर्थ सिस्टम मॉडलिंग और एक्सप्लेनेबल एआई की मदद से 2003 से 2020 तक के भूजल बदलावों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि एशिया के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों के करीब दो-तिहाई हिस्से में भूजल घटा है। सबसे ज्यादा गिरावट गंगा-ब्रह्मपुत्र, सिंधु और अमू दरिया जैसे घनी आबादी और भारी सिंचाई दबाव वाले बेसिनों में दर्ज की गई। हालांकि कुछ ऊंचाई वाले आंतरिक इलाकों में हल्की रिकवरी भी दिखी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि भूजल में बदलाव के पीछे करीब आधा योगदान जलवायु कारकों का है, जैसे ग्लेशियरों का पिघलना। लेकिन असली चिंता मानव गतिविधियों को लेकर है, खासकर सिंचाई के लिए पानी के अत्यधिक दोहन जो 2010 के बाद और तेज हुआ है।

अध्ययन चेतावनी देता है कि अगर जल प्रबंधन और सिंचाई नीतियों में समय रहते बदलाव नहीं किया गया, तो यह संकट और गहराएगा। आने वाले दशकों में इसका असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता और पर्यावरणीय संतुलन पर भी भारी पड़ सकता है।

(यह स्टोरी डाउन टू अर्थ से साभार ली गई है जिसे विस्तार से यहां पढ़ा जा सकता है।)

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